पत्रकार गौरी लंकेश की तीसरी पुण्यतिथि पर जाने मौत के बाद क्यों मनाया गया जश्न?

पत्रकार गौरी लंकेश की तीसरी पुण्यतिथि पर जाने मौत के बाद क्यों मनाया गया जश्न?
▶️बेबाक आवाज़, निर्भीक कलम और स्वतंत्र अभिव्यक्ति यानी गौरी लंकेश
▶️गौरी ने धार्मिक कट्टरता, हिंदुत्व और नक्सलवाद के खिलाफ हमेशा आवाज उठाई
▶️5 सितंबर 2017 को गौरी की हत्या के बाद विशेष तबके के लोगों द्वारा, शोक की जगह जश्न मनाया गया

लोकतांत्रिक देश भारत में किसी बेबाक आवाज़ और अभिव्यक्ति की यह पहली हत्या नहीं थी। 2013 में अंधविश्वास और कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाने वाले डॉक्टर नरेंद्र दाभोलकर (Narendra Dabholkar) की हत्या, 2015 में गोविंद पंसारे और साहित्यकार एमएस कुलबुर्गी (MS Kulbargi) की हत्या उनके ही घर में कर दी जाती है। न्याय हमेशा की भांति फाइलों के बीच में दब कर रह जाता है।


इसी संदर्भ में किसी लेखक ने लिखा:

‘अभिव्यक्ति की आजादी की कब्रगाह बनाता हो देश
दाभोलकर, पानसरे,कुलबुर्गी और अब गौरी लंकेश.’

जनता की पत्रकार गौरी

29 जनवरी 1962, जिला शिमोगा कर्नाटक में गौरी लंकेश (Gauri Lankesh) का जन्म हुआ। शुरुआती पढ़ाई बेंगलुरु से ही करने के बाद वर्ष 1983-84 में गौरी ने भारतीय जनसंचार संस्थान नई दिल्ली से पोस्ट ग्रैजुएट डिप्लोमा किया।

3rd Death Anniversary Of Journalist Gauri Lankesh
Source: School.in

गौरी की पत्रकारिता की शुरुआत 1985 में ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ से हुई, इसके बाद गौरी ने ‘संडे’ व वर्ष 1998 से 2000 तक ‘ईटीवी’ में ब्यूरो प्रमुख के रूप में काम किया। 2000 में गौरी लंकेश के पिता पी. लंकेश जोकि कन्नड़ भाषा के साहित्यकार, कवि और पत्रकार थे। उनके निधन के बाद गौरी ने उनके द्वारा संपादित होने वाली पत्रिका ‘लंकेश पत्रिके’ (Lankesh Patrike) के संपादन का कार्यभार संभाला और यहां से गौरी की कन्नड़ पत्रकारिता शुरू होती है।

धार्मिक कट्टरता, नक्सलवाद और जनता के साथ अन्याय के खिलाफ की आवाज बनी गौरी

गौरी का हमेशा ही विरासत में मिले लोकतंत्र और संविधान में भरोसा था। संविधान के मूल्यों में चलते हुए गौरी ने हमेशा जनता की आवाज को समाज के सामने लाने का प्रयास किया। गौरी ने कट्टर हिंदुत्व (Hindutva), नक्सलवाद, लिंग और भ्रष्टाचार के खिलाफ हमेशा लिखा था।

नक्सलवाद के ख़िलाफ़ लगातार आवाज उठाने के कारण गौरी का अपने बड़े भाई के साथ मतभेद उत्पन्न हो गया, जिस कारण 2005 में गौरी ने नया साप्ताहिक पत्रिका ‘गौरी लंकेश पत्रिके’ शुरू किया था। गौरी की पत्रकारिता हमेशा ही संघर्षपूर्ण रही और इस तरह जनता की आवाज बनते हुए, पत्रकारिता करना वर्तमान समय में प्रासंगिक और आसान दोनों नहीं लगती हैं।

गौरी की हत्या के बाद शोक की जगह जश्न क्यों?

5 सितंबर 2017, गौरी बेंगलुरु के पॉश इलाके राज राजेश्वर नगर (Raj Rajeshwar Nagar) स्थित अपने घर के बाहर गाड़ी से उतरती हैं। घर की ओर बढ़ती इससे पहले कुछ बाइक सवारों द्वारा गौरी की गोली मारकर हत्या कर दी जाती हैं। गौरी एक खौफनाक साजिश का शिकार आसानी से हो जाती हैं। अपने लेखों की वजह से गौरी कट्टरपंथियों की निशाने में थीं, इसी कारण गौरी की कलम और आवाज दोनों को हमेशा के लिये शांत कर दिया गया।

आमतौर पर किसी के मरने के बाद शोक मनाया जाता है, लेकिन गौरी की हत्या के बाद एक विशेष तबके के लोगों ने सोशल मीडिया पर गौरी की हत्या का जश्न मनाया। कुछ लोगों ने तो गौरी को ऐसे‌ अपशब्दों से संबोधित किया जिन्हें लिखना भी पत्रकारिता की नियमों में संभव नहीं है।

आजाद भारत में 70 वर्षों के बाद एक ऐसी महिला की हत्या कर दी जाती है, जो संविधान और लोकतंत्र के मार्ग पर चलकर जनता की आवाज बनी थीं। तो सवाल उठना ही चाहिए कि, क्या जो समाज के खिलाफ अन्याय की आवाज उठाएगा और बेबाक तरीके से पत्रकारिता करेगा! क्या उसे स्वतंत्र भारत में खतरा है?

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Juli Kumari

Juli Kumari

जूली एक सिंपल सी लड़की है जिसे खुद सजना और ख़बरों को अपने शब्दों से सजाना बेहद पसंद है। जूली को राजनीति, लाइफस्टाइल और कविताएं लिखने का भी काफी शौक है। आप The Toss News में जूली के लिखे हुए लेखों को पढ़ सकते हैं और पसंद आए तो शेयर भी कर सकते हैं। और एक राज़ की बात बताऊं? कमेंट कर के या हमारे Social Media Platforms पर मेकअप और हेयरस्टाइल टिप्स भी ले सकते हैं।